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ईरान-अमेरिका जंग पर लगा ब्रेक, कच्चे तेल की कीमतें 20% तक गिरी; $100 से नीचे आया क्रूड

 Edited By: Shivendra Singh
 Published : Apr 08, 2026 06:40 am IST,  Updated : Apr 08, 2026 06:46 am IST

पिछले 40 दिनों से दुनिया को दहला रही ईरान और अमेरिका के बीच की जंग पर अचानक ब्रेक लग गया है। जैसे ही दोनों देशों के बीच युद्धविराम का ऐलान हुआ, अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अब तक की सबसे बड़ी एकदिवसीय गिरावट दर्ज की गई। कच्चे तेल की कीमतें आसमान से सीधे जमीन पर आ गिरी हैं।

कच्चे तेल की कीमतों...- India TV Hindi
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट Image Source : CANVA

वैश्विक बाजार में बड़ी हलचल देखने को मिली है। ईरान और अमेरिका के बीच अचानक हुए सीजफायर के ऐलान के बाद कच्चे तेल की कीमतों में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई। कुछ ही घंटों में क्रूड ऑयल करीब 20% टूटकर 117 डॉलर से गिरकर 91 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इसे कोविड-19 के बाद तेल बाजार की सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट माना जा रहा है। आपको बता दें कि पिछले 40 दिनों से चल रहे तनाव के कारण तेल की कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही थी। लेकिन जैसे ही सीजफायर की खबर आई, यह प्रीमियम खत्म हो गया और कीमतों में तेज गिरावट आ गई।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना था संकट की जड़

इस पूरे संकट के केंद्र में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रहा, जो दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है। दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। ईरान द्वारा इस मार्ग को बंद करने की धमकियों ने ग्लोबल सप्लाई पर खतरा पैदा कर दिया था, जिससे कीमतों में भारी उछाल आया था।

ट्रंप ने किया सीजफायर का ऐलान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर सीजफायर की घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका ने अपने सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। उन्होंने बताया कि ईरान की ओर से 10 सूत्रीय प्रस्ताव मिला है, जिस पर बातचीत आगे बढ़ेगी। 10 अप्रैल को इस मुद्दे पर इस्लामाबाद में बातचीत होने की संभावना है। वहीं, ईरान ने साफ किया है कि यह सीजफायर जंग का अंत नहीं है। ईरान के अनुसार, उसने अपने ज्यादातर सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए हैं और आगे की रणनीति पर बातचीत जारी रहेगी। ईरान ने अमेरिका से सेना हटाने, प्रतिबंध खत्म करने और मुआवजे जैसी बड़ी मांगें भी रखी हैं।

निवेशकों के लिए क्या मायने?

तेल की कीमतों में आई इस गिरावट का असर वैश्विक बाजारों पर भी पड़ेगा। जहां एक ओर आयात करने वाले देशों को राहत मिल सकती है, वहीं तेल कंपनियों और निवेशकों के लिए यह झटका साबित हो सकता है।

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